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Hello Mithila

देवोत्थान

ब्रह्मेन्द्ररुद्राभिवन्द्यमानो भवानृषिर्वन्दितो वन्दनीयः ।
प्राप्ता त्वेयं किल कौमुदाख्या जागृष्व जागृष्व च लोकनाथ ॥
मेघा गता निर्मलपूर्णचन्द्रः शारदपुष्पाणि मनोहराणि ।
अहं ददानीति च पुण्यहेतो जागृष्व जागृष्व च लोकनाथ ।
उत्तिष्ठोतिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पते ।
त्वयि चोत्थीयमाने उत्थितं भवनत्रयम् ॥

अर्थ

जे ब्रह्मा, इन्द्र आ रुद्र द्वारा वन्दित छथि, जे ऋषि-मुनि द्वारा पूजनीय छथि, हे लोकनाथ! ई कौमुदी नामक ऋतु आबि गेल अछि; अतः जागू, जागू। मेघ हटि गेल अछि आ निर्मल पूर्णचन्द्र तथा मनोहर शारदीय फूल शोभा दऽ रहल अछि। हे लोकनाथ! पुण्य प्राप्तिक उद्देश्य सँ हम ई अर्पण करैत छी; अतः जागू, जागू। हे गोविन्द! उठू, उठू; हे जगत्पते! निद्रा त्यागू। अहाँक जागरण सँ तीनू लोक जागृत भऽ जाइत अछि।

कहिया पढ़ी

कार्तिक शुक्ल एकादशी, देवोत्थानक प्रातः।

विधि

शुद्ध आसन पर बैसि, पूर्व वा उत्तर दिशा दिस मुँह क' क' शान्त मन सँ पाठ करू। उच्चारण स्पष्ट राखू।