अर्थ
जे अगस्त्य मुनि कुम्भ सँ उत्पन्न भेल छथि आ मुनिमे श्रेष्ठ छथि, जे उदित भऽ संसारक पालन करैत छथि, हे लोकनाथ! ई अर्घ्य स्वीकार करू। शंख, फूल, फल, जल आ विभिन्न प्रकारक रत्न सँ युक्त ई अर्घ्य सेहो हे लोकनाथ! स्वीकार करू।
अपन मिथिला अपन एप्प · पण्डौल, मधुबनी, बिहार
कुम्भयोनिं समुद्भूतं मुनीनां मुनिसत्तमम् ।
उदयन्तं लोकनाथं अर्घ्योऽयं प्रतिगृह्यताम् ।
शङ्खं पुष्पं फलं तोयं रत्नानि विविधानि च ।
उदयन्तं लोकनाथं अर्घ्योऽयं प्रतिगृह्यताम् ॥