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Hello Mithila

अगस्त्यार्घ्यदान

कुम्भयोनिं समुद्भूतं मुनीनां मुनिसत्तमम् ।
उदयन्तं लोकनाथं अर्घ्योऽयं प्रतिगृह्यताम् ।
शङ्खं पुष्पं फलं तोयं रत्नानि विविधानि च ।
उदयन्तं लोकनाथं अर्घ्योऽयं प्रतिगृह्यताम् ॥

अर्थ

जे अगस्त्य मुनि कुम्भ सँ उत्पन्न भेल छथि आ मुनिमे श्रेष्ठ छथि, जे उदित भऽ संसारक पालन करैत छथि, हे लोकनाथ! ई अर्घ्य स्वीकार करू। शंख, फूल, फल, जल आ विभिन्न प्रकारक रत्न सँ युक्त ई अर्घ्य सेहो हे लोकनाथ! स्वीकार करू।

कहिया पढ़ी

अगस्त्य तारा उदय पर अर्घ्य दानक समय।

विधि

शुद्ध आसन पर बैसि, पूर्व वा उत्तर दिशा दिस मुँह क' क' शान्त मन सँ पाठ करू। उच्चारण स्पष्ट राखू।